जुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर दिवस 7 अगस्त 2017 जीवनी महत्वपूर्ण अनमोल वचन

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जीवनी महत्वपूर्ण अनमोल वचन

गुरदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर दिवस 7 अगस्त 2017 जीवनी

जुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जीवन परिचय

नाम  :-  रविन्द्रनाथ टैगोर ,रविंद्रनाथ ठाकुर ,गुरुदेवनाम :-रविन्द्रनाथ टैगोर ,रविंद्रनाथ ठाकुर ,गुरुदेव
जन्म  :-  7 मई  1861
जन्मस्थान  :-  कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ
मृत्यु:-  7 अगस्त  1941 (80)
मृत्यु स्थल  :- कोलकाता
पिता का नाम :- देवेन्द्रनाथ टैगोर
माता का नाम :- शारदा देवी
पत्नी का नाम :- मृणालिनी देवी  विवाह सन् 1883 में  धर्म :- हिन्दू  रास्ट्रीयता :- भारतीय  भाषा :- हिन्दी,  बंगाली ,इंग्लिशप्रमुख  रचना :- राष्ट्र-गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्र-गान ‘आमार सोनार बांग्ला’, ‘गीतांजलि’, पोस्टमास्टर, मास्टर साहब, गोरा, घरे-बाइरे  पुरस्कार :- नोबल पुरस्कार कार्यक्षेत्र :- साहित्य की सभी विधाएँ  उपलब्धियां :- विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार  विजेतापुरस्कार :- उपाधि सन 1913 ई. में ‘गीतांजलि’ के लिए नोबेल पुरस्कार, नाइटहुड (जलियाँवाला कांड के विरोध में उपाधि वापिस की)विशेष योगदान राष्ट्र गान के रचयिता

रवीन्द्रनाथ टैगोर जीवनी :-

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के सन्तान के रूप में 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही स्वदेश वापस आ गए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनकाअ विवाह हुआ।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मुख्य लेख व कृतियाँ :- गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं।
उनकी प्रकाशित कृतियों में – गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं।

रवीन्द्रनाथ टैगोर के जीवन की कार्यशैली :-

रबिन्द्रनाथ टैगोर कभी न रुकने वाले निरंतर कार्य करने पर विश्वास रखते थे रबिन्द्रनाथ टैगोर ने अपने आप मे ऐसे कार्य किये है जिससे लोगो का भला ही हुआ है उनमे से एक है शांतिनिकेतन की स्थापना शान्तिनिकेतन की स्थापना गुरुदेव का सपना था जो उन्होंने 1901 मे पूरा किया वह चाहते थे कि प्रत्येक विद्यार्थी कुदरत या प्रकृति के समुख पढ़े जिससे उसे बहुत ही अच्छा माहोल मिले इसलिये गुरुदेव ने शान्तिनिकेतन मे पेड़-पौधों और प्राकृतिक माहोल मे पुस्तकालय की स्थापना की रबिन्द्रनाथ टैगोर के अथक प्रयास के बाद शान्तिनिकेतन को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ जिसमे साहित्य कला के अनेक विद्यार्थी अध्यनरत हुए

रबिन्द्रनाथ ठाकुर की उपलब्धिया:-

रबिन्द्रनाथ टैगोर को अपने जीवन मे कई उपलब्धियों या सम्मान से नवाजा गया परन्तु सबसे प्रमुख थी गीतांजलि 1913 मे गीतांजलि के लिये रबिन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया
रबिन्द्रनाथ टैगोर ने भारत को और बंगला देश को उनकी सबसे बड़ी अमानत के रूप मे राष्ट्रगान दिया है जोकि अमरता की निशानी है हर महत्वपूर्ण अवसर पर राष्ट्रगान गाया जाता है जिसमे भारत का “जन-गण-मन ”है व बंगला देश का “आमार सोनार बांग्ला ”है यह ही नही रबिन्द्रनाथ टैगोर अपने जीवन मे तीन बार अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक से मिले जो रबिन्द्रनाथ टैगोर जी को रब्बी टैगोर कह कर पुकारते थे

रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनमोल विचार :-

1. आयु सोचती है, जवानी करती है।
2. कट्टरता सच को उन हाथों में सुरक्षित रखने की कोशिश करती है जो उसे मारना चाहते हैं।
3. पंखुडियां तोड़ कर आप फूल की खूबसूरती नहीं इकठ्ठा करते।
4. मित्रता की गहराई परिचय की लम्बाई पर निर्भर नहीं करती।
5. किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिये, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है।
6. खुश रहना बहुत सरल है …लेकिन सरल होना बहुत मुश्किल है।
7. जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है ; यदि हम उसे ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं।
8. आस्था वो पक्षी है जो सुबह अँधेरा होने पर भी उजाले को महसूस करती है।
9. मंदिर की गंभीर उदासी से बाहर भागकर बच्चे धूल में बैठते हैं, भगवान् उन्हें खेलता देखते हैं और पुजारी को भूल जाते हैं।
10. मैं एक आशावादी होने का अपना ही संसकरण बन गया हूँ. यदि मैं एक दरवाजे से नहीं जा पाता तो दुसरे से जाऊंगा- या एक नया दरवाजा बनाऊंगा
11. वर्तमान चाहे जितना भी अंधकारमय हो कुछ शानदार सामने आएगा।
12. मैं सोया और स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है. मैं जागा और देखा कि जीवन सेवा है. मैंने सेवा की और पाया कि सेवा आनंद है।
13. यदि आप सभी गलतियों के लिए दरवाजे बंद कर देंगे तो सच बाहर रह जायेगा।
14. केवल प्रेम ही वास्तविकता है , ये महज एक भावना नहीं है.यह एक परम सत्य है जो सृजन के ह्रदय में वास करता है।
15. जब मैं खुद पर हँसता हूँ तो मेरे ऊपर से मेरा बोझ कम हो जाता है।
16. तितली महीने नहीं क्षण गिनती है, और उसके पास पर्याप्त समय होता है।
17. अकेले फूल को कई काँटों से इर्ष्या करने की ज़रुरत नहीं होती।
18. धुल स्वयं अपमान सह लेती है ओर बदले में फूलों का उपहार देती है
19. मुखर होना आसान है जब आप पूर्ण सत्य बोलने की प्रतीक्षा नहीं करते।
20. हम दुनिया में तब जीते हैं जब हम उसे प्रेम करते हैं।
21. सिर्फ खड़े होकर पानी देखने से आप नदी नहीं पार कर सकते।
22. जिनके स्वामित्व बहुत होता है उनके पास डरने को बहुत कुछ होता है।
23. हम तब स्वतंत्र होते हैं जब हम पूरी कीमत चुका देते हैं।
24. तर्कों की की झड़ी, तर्कों की धूलि और अन्धबुद्धि ये सब आकुल व्याकुल होकर लौट जाती है, किन्तु विश्वास तो अपने अन्दर ही निवास करता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं है।
25. स्वर्ण कहता है -मुझे न तो आग से तपाने का दुःख है , न काटने पीसने से और न कसौटी पर कसने से, मेरे लिए तो जो महान दुःख का कारण है, वह है घुंघची के साथ मुझे तोलना।

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