December 10, 2016
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साक्षरता मिशन की परिभाषा,साक्षरता मिशन पर निबंध ,भाषण ,कविता , कहानी,स्लोगन और साक्षरता का महत्व

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साक्षरता की परिभाषा -Sakshrta ki Pribhasha

साक्षरता का अर्थ है जो आदमी अपना नाम लिख सके ,और पढ सके उसे साक्षर मन जाता हैं भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के अनुसार अगर कोई व्यक्ति अपना नाम लिखने और पढने की योग्यता हासिल कर लेता है तो उसे साक्षर माना जाता है।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन – National Literacy Mission :

भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना 5 मई 1988 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी। इसका उद्देश्य 2007 तक 15 से
34 वर्ष की आयु वर्ग के परुष व महिला समूह के निरक्षर लोगों को व्यावहारिक साक्षरता प्रदान करते हुए 15 प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना था ।
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग भारत के प्रधानमंत्री की एक उच्चस्तरीय सलाहकार संस्था है, जिसका उद्देश्य भारत को ज्ञानवान समाज बनाना है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का ध्यान शिक्षा से लेकर ई-प्रशासन तक ज्ञान तंत्र के पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर केन्द्रित है :

सुलभता,साक्षरता,भाषा,अनुवाद,पुस्तकालय,नेटवर्क,पोर्टल्स,सिध्दांत,स्कूली शिक्षा,व्यावसायिक शिक्षा,उच्च शिक्षा,चिकित्सा शिक्षा,कानून की शिक्षा,प्रबंधन शिक्षा,इंजीनियरिंग शिक्षा,मुक्त और दूरस्थ शिक्षा.

रचना

विज्ञान और टैक्नॉलॉजी,बौध्दिक संपदा अधिकार,अभिनव प्रयास,उद्यमशीलता,उपयोग,पारंपरिक ज्ञान,कृषि,सेवाएँ,ई-प्रशासन,साक्षरता मिसन,

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरूआत 1988 में इस इरादे से की गई थी कि 15-35 आयु वर्ग में निरक्षर लोगों को सन् 2007 तक 75 प्रतिशत साक्षर बना दिया जाएगा और इस स्तर को कायम रखा जाएगा। यह मिशन स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों के जरिए लोगों को एकजुट करने और साक्षरता को सामाजिक शिक्षा और जागरूकता के व्यापक कार्यक्रम में शामिल करने के उपायों पर निर्भर था। 2001 की जनगणना से पता चलता है कि देश में साक्षरता का स्तर 1991 में 52.21 प्रतिशत से बढ़कर 65.38 प्रतिशत तक पहुँच गया। पहली बार निरक्षर लोगों की कुल संख्या में गिरावट आई। इस एक दशक
के दौरान निरक्षरों की वास्तविक संख्या 32.90 करोड़ से घटकर 30.40 करोड़ रह गई। किन्तु राष्ट्रीय औसत के इस पर्दे के पीछे बहुत अधिक विसंगतियाँ, कुछ क्षेत्रों में निरक्षरता और क्षेत्र, जाति और लिंग आदि जैसे कारणों से मौजूद भिन्नता सिरदर्द बनी हुई है। इतना ही नहीं निरक्षर लोगों की कुल संख्या अब भी बहुत अधिक है और ज्ञानवान समाज के लक्ष्य की तरफ बढ़ता कोई भी देश अपनी इतनी विशाल आबादी को निरक्षर नहीं रहने दे सकता।

  • राष्ट्रीय ज्ञान आयोग निम्नलिखित कुछ विषयों पर विचार कर रहा है :
  • राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का दोबारा आकलन ;
  • साक्षरता कार्यक्रमों और कम्प्यूटर आधारित शिक्षा अभियानों में आईसीटी के उपयोग जैसे साक्षरता प्रयासों के लिए बहुमुखी रणनीति ;
  • सामग्री का विकास और प्रशिक्षण ;
  • साक्षरता में अभिनव सिध्दांतों और प्रयासों के लिए नए विचार ;
  • औपचारिक एवम् अनौपचारिक शिक्षा प्रणाली के साथ समकक्षता

भाषा

भारत एक हिंदी भाषी राष्ट्र होने के बाद भी यहाँ पर विभिन्न प्रकार की भाषा बोलने वाले आदमी रहते हैं ,लेकिन यहाँ पर सभी लोगो के साथ समानता का व्यवहार किया जाता हैं सभी भाषाओ का सम्मान किया जाता हैं | भारत विवधता में एकता प्रदान करने वाला देश हैं | भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा न सिर्फ सिखाने या बातचीत करने के माध्यम के रूप में महत्वपूर्ण है, बल्कि ज्ञान और विभिन्न सेवाओं की सुलभता निश्चित करने में भी इसकी प्रमुख भूमिका है। मौजूदा स्थिति में अंग्रेजी भाषा की समझ और उस पर मज़बूत पकड़ शायद उच्च शिक्षा, रोजगार की सँभावनाओं और सामाजिक अवसरों की सुलभता तय करने के
लिए सबसे महत्वपूर्ण है। स्कूल छोड़ने वाले जो बच्चे अंग्रेजी भाषा में पूरी तरह दक्ष नहीं होते, वे हमेशा उच्च शिक्षा के मामले में पिछड़े रहते हैं। जिन्हें अंग्रेजी अच्छी तरह से नहीं आती उन्हें हमारे प्रमुख शिक्षाण संस्थानों में दाखिला पाने के लिए मुकाबला करने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। काम की दुनिया में, न सिर्फ पेशेवर व्यवसायों में बल्कि साधारण नौकरियों में भी ये मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

अनुवाद

भारतीय भाषा को उच्च कोटि की बनाने के लिए उसका अनुवाद करना बहुत आवश्यक हैं |

अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ज्ञान की सुलभता बढ़ाने और शिक्षा तथा ज्ञान की रचना और प्रसार में लोगों की भागीदारी को मजबूत करने के लिए उत्तम कोटि की अनुवादित सामग्री आवश्यक है। किन्तु अनुवाद के लिए मौजूदा सुविधाएँ अपर्याप्त हैं। एक तरफ पूरी माँग का अंदाजा नहीं लग पाया है और दूसरी तरफ पूरी जानकारी समान रूप से उपलब्ध नहीं है। अत: अनुवाद उद्योग का दायरा, पैमाना और क्वालिटी सुधारने के लिए जनता का थोड़ा-बहुत हस्तक्षेप आवश्यक है।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग निम्नलिखित कुछ विषयों पर विचार कर रहा है :

  • अनुवाद को उद्योग के रूप में विकसित करना ;
  • मुद्रित और वर्च्युल प्रकाशनों को प्रोत्साहन ;
  • शिक्षण सामग्री का अनुवाद कराना और अनुवाद के लिए प्रशिक्षण देना;
  • भारतीय भाषाओं और दक्षिण एशिया के अन्य साहित्य का प्रचार करना;
  • अनुवाद के बारे में सूचना का भंडार बनाना।

पुस्तकालय

भारत सरकार ने भारत के आम नागरिको को व्यापक रूप से ज्ञान प्रदान करने के लिए पुस्तकालयो की जगह जगह स्थापना की गई हैं |ज्ञान सबको व्यापक रूप से सुलभ कराने में पुस्तकालयों की भूमिका पर किसी को कोई संदेह नहीं है। आज के संदर्भ में पुस्तकालय दो अलग-अलग भूमिकाएँ निभा सकते हैं। वे सूचना और ज्ञान के स्थानीय केन्द्र बन सकते हैं और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान के स्थानीय प्रवेश द्वार बन सकते हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मौजूदा पुस्तकालयों को अपनी पुस्तक संग्रह, सेवाओं और सुविधाओं को आधुनिक बनाना होगा, खुद बढ़-चढ़कर काम करना होगा, दूसरी संस्थाओं, एजेंसियों और गैरसरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम करना होगा ताकि समुदाय आधारित सूचना प्रणाली विकसित की जा सके।

  • राष्ट्रीय ज्ञान आयोग निम्नलिखित कुछ विषयों पर विचार कर रहा है:
    पुस्तकालयों के लिए संस्थागत ढाँचा ;
  • नेटवर्किंग ;
  • शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान ;
  • पुस्तकालयों को आधुनिक बनाना और उनमें कम्प्यूटर का इस्तेमाल  ;
  • निजी और व्यक्तिगत संग्रहों का संरक्षण ;
  • बदलती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता।

ज्ञान नेटवक्र्स

भारत देश में पर्याप्त संख्या में उत्तम प्रशिक्षित कर्मी तैयार करने की चुनौती को पूरा करने के लिए शिक्षा का विशाल बुनियादी ढाँचे और संसाधनों की ज़रूरत है। उपयुक्त अनुसंधान सुविधाओं वाली पर्याप्त उत्तम शिक्षा संस्थाओं की आवश्यकता में तो कोई ढील नहीं दी जा सकती, लेकिन इस चुनौती को पूरा करने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि उत्कृष्टता के केन्द्रों में सीमित संख्या में मौजूद शिक्षण सामग्री, उपकरणों और सुविधाओं को देश भर में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों और तकनीकी, कृषि तथा चिकित्सा संस्थानों के साथ बाँटा जाए। इसके अतिरिक्त दुनिया भर में विभिन्न संस्थाओं के बीच और देशों के बीच
सहयोग से विभिन्न क्षेत्रों में बहुत बड़ी तादाद में अनुसंधान और विकास गतिविधियाँ चल रही हैं। अनुसंधान के दौरान बहुत अधिक गणना और बहुत अधिक ऑंकड़ों की समस्याओं के कारण ऐसा सहयोग आवश्यक हो गया है। इस विधि में विचार-विमर्श, ऑंकड़ों और संसाधनों को एक-दूसरे के साथ बाँटने की बहुत अधिक आवश्यकता है। अत: ऐसी सुविधाओं की व्यवस्था करना आवश्यक है, जिनमें भारतीय शोधकर्ता काफी उचित लागत पर इस तरह के सामूहिक प्रयास चला सकें। यूरोप में 1980 के दशक में अनुसंधान और विकास के बुनियादी ढाँचे और ऑंकड़ों को एक-दूसरे के साथ बाँटने का जो सिलसिला शुरू
हुआ था, उसे दुनिया के कई देश अपना चुके हैं और अब वह भारत के लिए भी एक व्यावहारिक समाधान बन सकता है।

इस संदर्भ में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के एक प्रोजेक्ट में देश भर में सभी विश्वविद्यालयों, अनुसंधान और विकास संस्थाओं, विज्ञान और टैक्नॉलॉजी संस्थानों, स्वास्थ्य सेवा प्रतिष्ठानों, कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाओं और पुस्तकालयों को (कई हजार नोड्स के साथ) कम से कम 100 एमबीपीएस की स्पीड पर जोड़ने के लिए एक प्रभावकारी और लागत के अनुसार लाभकारी नेटवर्क डिजाइन करने की सँभावना का पता लगाया गया। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के लिए एक बाहरी विशेषज्ञ डॉक्टर डीपीएस सेठ ने एक श्वेत पत्र तैयार किया है, जिसमें सिध्दांतों और विधियों का उल्लेख है। यह रिपोर्ट संबध्द हितधारकों के बीच व्यापक रूप से बाँटी गई और इस बारे में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशें तय करते समय उनकी राय और सुझावों को शामिल किया गया। सिफारिशें प्रधानमंत्री को सौंपी जा चुकी हैं।

स्वास्थ्य सूचना नेटवक्र्स

भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने की व्यवस्था का स्तर सुधारने के लिए एक विश्वसनीय, फुर्तीली और निश्चित समय के भीतर काम करने वाली स्वास्थ्य ऑंकड़ा संग्रह प्रणाली की आवश्यकता है। इतना ही नहीं स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाली संस्थाओं की बढ़ती रफ्तार के कारण ऑंकड़े जुटाने और उनके प्रसार के बारे में बहुत सारे परस्पर विरोधी मानक तैयार होने की वजह से स्वास्थ्य देखभाल सेवा की लागत बहुत बढ़ जाएगी। अत: इसे रोकने और आज दुनिया में पक्की हो चुकी स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्थाओं के सामने मौजूद दूसरी समस्याओं का समाधान करने के लिए एक स्वास्थ्य नेटवर्क की तत्काल आवश्यकता है।

इस आवश्यकता को समझते हुए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने स्वास्थ्य सूचना नेटवर्क के बारे में इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का एक कार्यदल बनाया। यह कार्यदल विस्तृत विचार-विमर्श करने वाला है और राष्ट्रीय स्तर पर वेब आधारित, सुरक्षित, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली चलाने के लिए आवश्यक आईटी और क्लीनिकल मानकों तथा नियामक ढाँचे जैसे मुद्दों पर विचार कर रहा है। कार्यदल की पहली बैठक 21 अगस्त 2006 को हुई थी।

पोर्टल्स

वेब पोर्टल वास्तव में एक वेबसाइट या ऐसी सेवा है, जहाँ से किसी भी विषय के बारे में सारी सूचना एक जगह सुलभ हो जाती है और इस्तेमाल करने वाले एक ही जगह केस स्टडीज़, ई-मेल ग्रुप्स, फोरम्स और सर्च इंजन जैसे विविध स्रोतों और सेवाओं की रचना कर सकते हैं और उन्हें एक-दूसरे के साथ बाँट सकते हैं। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग यह मानता है कि विकेन्द्रीकरण, सूचना का अधिकार, जन-भागीदारी और पारदर्शिता की तरफ बढ़ते प्रयासों के इस दौर में सार्वजनिक पोर्टल जैसे साधन यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि अधिक-से-अधिक लोग अपने अधिकारों का उपयोग करें।

इस संदर्भ में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने कुछ प्रमुख क्षेत्रों में सार्वजनिक पोर्टल खोलने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई है:

  • चैम्पियन/अग्रणी संगठन की पहचान,
  • चैम्पियन संगठन द्वारा पोर्टल की साज-सज्जा के बारे में अपने प्रस्ताव आयोग के सामने विचार के लिए रखना,
  • हितधारकों और साझीदारों की पहचान और पोर्टल के प्रबंध के लिए ढाँचे की व्यवस्था
  • सामग्री का विकास
  • पोर्टल का शुभारंभ

भारत जल पोर्टल/इंडिया वॉटर पोर्टल का विकास एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट, अर्घ्यम ट्रस्ट कर रहा है। जनवरी 2006 में शुरू किया गया यह काम दिसम्बर 2006 में पूरा होना है।

  • यह पोर्टल जल क्षेत्र के बारे में सूचना और ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए खुला मंच बन जाएगा। इस पोर्टल के मूल उद्देश्य हैं:
  • पानी के प्रबंध के बारे में आम जनता में जागरूकता बढ़ाना और उसके विभिन्न पहलुओं को उजागर करना।
  • सफल तकनीकों और अनुभवों को गंभीरता से काम करने वालों के बीच बाँटना।
  • विभिन्न हितधारकों के बीच सूचना के प्रवाह के लिए एक मंच प्रदान करना।
  • भारत ऊर्जा पोर्टल/इंडिया एनर्जी पोर्टल भी इसी तरह विकसित किया जा रहा है। ऊर्जा पोर्टल के मुख्य कार्यकलापों में शामिल हैं:
  • स्रोतों की पहचान और ऊर्जा के बुनियादी पहलुओं के बारे में आवश्यक जानकारी प्रदान करना।
  • ऑंकड़ों और सूचनाओं को व्यापक रूप में प्रदान करना।
  • सूचना को कुशल और प्रभावकारी ढंग से निकालने की सुविधा देना।
  • ज्ञान का भंडार बनाना और उसमें नई-नई सूचनाएँ शामिल करना।
  • परस्पर संपर्क और विचार-विमर्श के लिए मंच प्रदान करना।
  • भारत पर्यावरण पोर्टल/ इंडिया एनवायरनमेंटल पोर्टल बनाने का प्रस्ताव विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र से मिला है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग इस पर विचार कर रहा है

स्कूली शिक्षा

स्कूली शिक्षा से जुड़े मुद्दों का समाधान करना आवश्यक है ताकि ज्ञानवान समाज की नींव पड़ सके। भारत को 21वीं शताब्दी के लिए तैयार करने और विकास की प्रक्रिया में समाज के सभी हिस्सों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए समाज के हर तबके और हर परिस्थिति से आने वाले बच्चों को सशक्त बनाना आवश्यक है।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग निम्नलिखित में से कुछ विषयों पर विचार कर रहा है :

  • केन्द्रीय समर्थन और केन्द्रीय कानून ;
  • विधेयक के लिए समय सीमा और वित्तीय प्रावधान ;
  • समान स्कूल व्यवस्था और निजी स्क्ूलों की जिम्मेदारी ;
  • शिक्षा का स्तर ;
  • सब के लिए स्कूली शिक्षा।

व्यावसायिक शिक्षा

भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू कुशल और पढ़ी-लिखी श्रमशक्ति का विकास करना और बूढ़े होते पश्चिमी समाजों की तुलना में युवा राष्ट्र होने का लाभ लेना है। तकनीशियन और अन्य कुशल कारीगर और दस्तकार मैन्युफेक्चरिंग तथा बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं के विकास के स्तंभ हैं। कुशल कारीगरों की माँग बढ़ रही है, लेकिन ऑंकड़े बताते हैं कि मौजूदा व्यवस्था यह माँग पूरी नहीं कर पा रही है, क्योंकि जो कौशल सिखाए जा रहे हैं वे बाजार की ज़रूरतों से मेल नहीं रखते। बदलते संदर्भ में इस व्यवस्था को अधिक प्रासंगिक बनाने और जनसंख्या में युवाओं का अनुपात अधिक होने की
विशेषता से भविष्य में लाभ उठाने के लिए व्यावसायिक शिक्षा देने का ऐसा मॉडल बनाना ज़रूरी है, जो लचीला, स्थाई, सबको समाहित करने वाला और रचनात्मक हो।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग निम्नलिखित विषयों पर विचार कर रहा है:

  • मौजूदा संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करना;
  • क्षमता बढ़ाने के लिए वैकल्पिक ढाँचे तैयार करने, जिसमें सार्वजनिक निजी साझेदारी, कम्प्यूटर आधारित प्रशिक्षण, दूरस्थ शिक्षा और स्थानीय
  • आवश्यकताओं तथा क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए एक विकेन्द्रित मॉडल शामिल हैं
  • कुशल कारीगरों की बढ़ती माँग को पूरा करना और श्रमिकों को अनौपचारिक तथा असंगठित क्षेत्र में प्रशिक्षण देना
  • नियामक और प्रमाणन तंत्र की स्थापना;
  • व्यावसायिक शिक्षा को हाथ की मजदूरी से जोड़ कर हेय दृष्टि से देखने की समस्या से छुटकारा पाने के लिए देश भर में इसकी नई छवि बनाना।उच्च शिक्षा

भारत में उच्च शिक्षा का मतलब सेकेंडरी स्कूल से आगे की पढ़ाई है। उच्च शिक्षा के बारे में मध्यकालिक व्यापक उद्देश्य सकल भर्ती अनुपात को 2015 तक कम से कम 15 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा। इसका अर्थ यह है कि अगले पाँच वर्ष के भीतर उच्च शिक्षा का दायरा दुगुने से भी अधिक फैलाना होगा। क्वालिटी को कमजोर किए बिना यह दायरा बढ़ाना होगा और शिक्षा का स्तर उठाना होगा तथा उच्च शिक्षा को ज्ञानवान समाज के आवश्यकताओं और अवसरों के लिए अधिक उपयोगी बनाना होगा। इस बात को भी व्यापक मान्यता मिल रही है कि उच्च शिक्षा को समाज के सभी वर्गों के लिए अधिक सुलभ बनाना ज़रूरी है।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग निम्नलिखित विषयों पर विचार कर रहा है :

  • उच्च शिक्षा की मात्रा औश्र क्वालिटी से जुड़े व्यवस्था संबंधी मुद्दे;
  • नियामक ढाँचा ;
  • उच्चा शिक्षा की सुलभता;
  • उच्च शिक्षा के लिए धन की व्यवस्था;
  • विश्वविद्यालयों का संस्थागत ढाँचा
  • संचालन और प्रशासन
  • पाठयक्रम और परीक्षा आदि का तंत्र;

चिकित्सा शिक्षा

भारत में न सिर्फ गाँवों और शहरों के बीच बल्कि अलग-अलग राज्यों के बीच भी स्वास्थ्यकर्मियों और स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण में बहुत अंतर है। चिकित्सा शिक्षा देने वाले सभी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज शहरी इलाकों में हैं, जहाँ सिर्फ 30-35 प्रतिशत आबादी रहती है। स्वास्थ्य परिणाम बताते हैं कि पिछले 60 वर्ष के दौरान चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम इन दोनों स्थितियों को बदलने में नाकामयाब रहे हैं। अत: हमें अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था में जबर्दस्त बदलाव की करना होगा ताकि मौजूदा मेडिकल कॉलेजों का स्तर सुधारने के लिए आवश्यक परिवर्तन किए जा सकें और मेडिकल कॉलेजों को चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान और
टैक्नॉलॉजी में हुई जबर्दस्त प्रगति के अनुरूप ढाला जा सके। साथ ही गाँवों में चिकित्सा शिक्षा की कमी की समस्या पर भी ध्यान देना होगा। इसके लिए मौजूदा कॉलेजों में ऐसे अभिनव प्रयास अपनाने होंगे, जिनसे हमारी ज़रूरतों के अनुसार ग्रामीण चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम चलाए जा सकें और ग्रामीण चिकित्सकों को देश के मौजूदा मेडिकल कॉलेजों के भीतर ही प्रशिक्षण दिया जा सके।

कानूनी शिक्षा

कानून की शिक्षा पेशेवर शिक्षा का एक ऐसा पहलू है, जो न सिर्फ समाज में कानून के ऐतिहासिक उपयोगिता की दृष्टि से, बल्कि भूमंडलीकरण के मौजूदा संदर्भ में भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। कानून की शिक्षा ज्ञान के सिध्दांतों की रचना करने और उन्हें उन सिध्दांतों को समाज में अपनाने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। शिक्षा, मुकदमेबाजी, कंपनियों की क्रियाविधियों, सरकार और समाज में प्रशिक्षित कानूनी जानकारों की आवश्यकता पिछले कुछ वर्षों में बहुत अधिक बढ़ गई है और ऐसा अनुमान है कि आने वाले वर्षों में कानून के जानकार प्रशिक्षित व्यक्तियों की माँग बेहिसाब बढ़ेगी। अत: भारत में कानून की शिक्षा
के बारे में एक स्पष्ट दीर्घकालिक नीति बनाना बहुत आवश्यक है। इस नीति में लगातार उत्कृष्टता बनाए रखने पर ध्यान देना होगा।

 

साक्षरता का अर्थ – Means of Literacy

साक्षरता का अर्थ केवल हस्ताक्षर कर पाने की योग्यता भर नहीं है। जैसा कि प्रौढ़ साक्षरता के विभिन्न कार्यक्रमों में जोर देकर बार-बार बताया जाता है। इन अभियानों के चलते ‘साक्षरता’ का मतलब काफी सीमित अर्थों में लिया जाता है। जबकि वास्तविक अर्थों में देखें तो साक्षरता का अर्थ है कि व्यक्ति किसी सामग्री को अपनी भाषा में पढ़कर समझ सके। उसका आनंद ले सके।इसके साथ ही अपनी रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए अपनी इस क्षमता का इस्तेमाल कर सके। साक्षरता की इसी कड़ी में ‘अर्ली लिट्रेसी’ या प्रारंभिक साक्षरता की अवधारणा आई। इसके बारे में बताते हुए प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार अपने एक लेख में कहते हैं, “अर्ली लिट्रेसी का अर्थ है कि बच्चों के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया में ही उसे पढ़ना-लिखना सिखाना जरूरी है क्योंकि पढ़ना एक बुनियादी कौशल है।“

साक्षरता का महत्व – Importance of Literacy

किसी भाषा में लिखी सामग्री को समझकर पढ़ने का कौशल जीवन के हर क्षेत्र में काम आता है। अगर किसी इंसान को पढ़ना नहीं आता है तो उसे किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसे हर पढ़ा-लिखा आदमी आम शब्दावली में साहब नज़र आता है। साक्षरता या पढ़ने का कौशल एक आत्मविश्वास देता है, चीज़ों को समझने का एक जरिया।किसी लिखी हुई सामग्री के बारे में सोचने और उसका विश्लेषण करने का। इसलिए साक्षरता को केवल अक्षरों तक सीमित नहीं करना चाहिए। केवल नाम लिख लेना भर पर्याप्त नहीं है। नाम लिखना-पढ़ना तो बच्चों को दो-तीन महीने में सिखाया जा सकता है, इससे वे अपना और दूसरे का नाम लिख-पढ़ लेंगे। मगर सिर्फ नाम में क्या रखा है, वाली बात सामने होगी। असली मुद्दा तो नाम से आगे जाने का है ताकि इंसान दुनिया में अपने अस्तित्व को सम्मान के साथ जी पाए

साक्षरता पर निबंध : Sakshrta par Essay

साक्षरता शिक्षा मनुष्य के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । दूसरे शब्दों में, शिक्षा के बिना मनुष्य का सम्यक् अर्थात् सर्वांगीण विकास संभव नहीं है । शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य ज्ञान की ओर अग्रसर होता है और ज्ञान ही उसकी वैचारिक एवं बौद्‌धिक क्षमता की वृद्धि करता है ।

स्त्रियों, प्रौढ़जनों व अन्य अशिक्षित जनों को शिक्षा प्रदान करना हम सब का नैतिक कर्तव्य है । यह निस्संदेह देश के विकास के लिए एक उपयोगी कदम है । देश भर में चलाया गया सर्वशिक्षा अभियान इसी दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम है । सर्वशिक्षा अभियान का उद्‌देश्य राष्ट्रीय विकास के लिए जन-जन तक शिक्षा को पहुँचाना है ताकि रूढ़िवादी परंपराओं के अंधकार से निकलकर मनुष्य ज्ञान के प्रकाश की ओर उम्मुख हो सके ।

इस अभियान के अंतर्गत सभी को, विशेषकर उन व्यक्तियों को जो किसी कारणवश स्वयं शिक्षा ग्रहण नहीं कर सके, उनमें पढ़ने की रुचि पैदा की जाती है । साथ ही उन्हें शिक्षा के महत्व को समझाया जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियों को निरक्षर बने रहने से रोका जा सके ।

साक्षरता अथवा सर्वशिक्षा अभियान का प्रारंभ सन् 1937 ई॰ में राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में हुआ जिसके अंतर्गत प्रौढ़ शिक्षा केंद्र व रात्रि पाठशालाएँ खोली गईं । देशभर में नए पुस्तकालयों एवं वाचनालयों की स्थापना हुई परंतु सर्वशिक्षा अभियान के कार्यक्रमों को व्यापकता स्वतंत्रता के बाद ही मिली । शिक्षा के स्वरूप पर पुनर्विचार हुआ जिससे शिक्षा का लाभ ग्रामीण अंचलों को भी पूर्ण रूप से मिल सके ।

इस अभियान का उद्‌देश्य ऐसे सभी युवक-युवतियों को सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक व तकनीकी शिक्षा प्रदान करना रहा है जो किसी कारणवश स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाए हैं । प्रौढ़ शिक्षा केंद्र तथा सांध्यकालीन कक्षाओं की व्यवस्था इसी कमी की पूर्ति हेतु की गई है।

आज आवश्यकता इसकी अधिक है कि सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से प्राथमिक शिक्षा मिल सके । बच्चों को शिक्षित कर हम राष्ट्र का भविष्य सँवार सकते हैं । यदि हम बच्चों को शिक्षा देने के लक्ष्य से दूर हैं तो सर्वशिक्षा अभियान की बात ही बेमानी हो जाती है । शिक्षा चूँकि राज्य सरकारों का भी विषय है, अत: अलग-अलग सरकारें शिक्षा-व्यवस्था के प्रति भिन्न नजरिया रखती हैं ।

सत्तर के दशक तक हमारी संपूर्ण जनसंख्या का केवल एक चौथाई हिस्सा ही शिक्षित वर्ग में आता था । किसी भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए यह सबसे दुष्कर समस्या है क्योंकि इस अवस्था में शासन पद्‌धति का सुचारू रूप से चलना संभव नहीं होता है । सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत समय-समय पर अनेक योजनाएँ बनाई गईं परंतु यह अभी पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकी है ।

आज भी हमारी जनसंख्या का अधिकांश भाग निरक्षर है । हमारी निरक्षरता ही प्रगति की दौड़ में हमारे पीछे रहने का एक प्रमुख कारण है । हमारे कामगार, किसान व अन्य व्यक्तियों में निर्धनता के कारण शिक्षा की ओर अपना ध्यान आकृष्ट नहीं कर पा रहे हैं । कुछ लोग किसी समस्या के चलते इस अभियान में भाग नहीं ले पाते हैं । अन्य लोगों में पढ़ाई के नाम से ही नीरसता का अनुभव होता है । शिक्षा उन्हें सुनने में ही अच्छी लगती है परंतु वे इसमें रुचि नहीं दिखाते हैं ।

हमारे पास वित्तीय संसाधनों की कमी भी इस अभियान की असफलता का प्रमुख कारण बनती है । लाखों की संख्या में शिक्षित लोग बेरोजगार हैं, उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं । इन परिस्थितियों में अशिक्षितों को शिक्षा प्रदान करने के प्रयासों को धक्का पहुँचता है ।

मेरा मानना है कि हमारा देश विकास की दौड़ में अग्रणी देशों में तब तक सम्मिलित नहीं हो सकता जब तक देश में लोग निरक्षर बने रहेंगे । यदि हम विकसित देशों की ओर देखें तो हम पाएँगे कि वहाँ शिक्षा का प्रचार-प्रसार अधिक है । वहाँ अधिकांश लोग शिक्षित हैं जिसके कारण ही वे हमसे बहुत आगे हैं ।

हमारे देश के कई छोटे-छोटे राज्य पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य के करीब हैं लेकिन उत्तर व दक्षिण भारत के अधिकांश बड़े राज्यों में स्थिति चिंताजनक कही जा सकती है । अशिक्षा के कारण लोगों में अपने परिवेश, अपने समाज और अपने राष्ट्र के प्रति उचित समझदारी नहीं आ पाती है । निरक्षर लोग लोकतंत्र के मूल सिद्‌धांतों को समझने में असमर्थ होते हैं । अत: हमारा सर्वशिक्षा अभियान राष्ट्र के विकास के लिए स्वयं में एक अनिवार्यता है ।

इस अभियान में सरकार विशेष रूप से अपना योगदान कर रही है परतु केवल सरकार का योगदान ही पर्याप्त नहीं है । इसके लिए समाज के सभी वर्गों को आगे आना होगा । सभी को एकजुट होकर अशिक्षा व निरक्षरता के अंधकार को मिटाने का संकल्प लेना होगा । मेरी कोशिश यह होगी कि मैं कम से कम दो लोगों को पूर्ण साक्षर बना सकूँ और मेरी तरह ही प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति इसी प्रकार का संकल्प लें तो बड़ी ही सहजता से सर्वशिक्षा अभियान को सफल बनाया जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त मैं अपने संपर्क में आने वाले समस्त शिक्षित लोगों से आग्रह व उन्हें प्रोत्साहित करूँगा कि एक सच्चा भारतीय नागरिक होने के कारण वे निरक्षरता की इस राष्ट्रीय समस्या के निदान हेतु अपना हरसंभव योगदान करें क्योंकि साक्षरता आज की सबसे प्रमुख आवश्यकता है । आइए, हम सब एकजुट होकर सर्वशिक्षा अभियान को सफल बनाने का संकल्प लें ।

साक्षरता पर कहानी – Literacy on Story

एक गांव में एक बिल्ली रहती थी। नाम था उसका झबरी। गांव के बच्चे प्यार से उसे झबरी मौसी कहते थे। झबरी मौसी के छोटे-छोटे प्यारे से दो जुड़वां बच्चे भी थे। एक का नाम था चिंटू और दूसरे का नाम था पिंटू। चिंटू और पिंटू सारा दिन उछल-कूद करते तो झबरी मौसी उन्हें खूब समझाती लेकिन उन पर अपनी मां की बातों का कोई असर नहीं होता। रात को सोने से पहले झबरी मौसी चिंटू और पिंटू को रोजाना एक नई कहानी सुनाती। तब कहीं जाकर वे अपनी मां की गोद में सोते। दिन बीतते गए। चिंटू और पिंटू भी बड़े होते गए। अब वे अपनी मां के साथ बाहर घूमने जाने लगे। एक दिन चिंटू ने अपनी मां से पूछा- मां हम दोनों
भाई बाहर घूम आएं क्या ? झबरी मौसी बोली, ना बेटे अकेले बाहर मत जाना। वहां तुम्हें कोई आदमी पकड़कर अपने घर पर रख लेगा। चिंटू बोला, अच्छा मां, हम बाहर नहीं जाएंगे। कुछ देर बाद झबरी मौसी गांव में खाने की खोज में निकल पड़ी। तब चिंटू अपने भाई पिंटू से बोला, पिंटू भैया, अब अच्छा मौका है। मां तो बाहर गई हुई है। अपने भी कहीं से खाना ले आते हैं। पिंटू जाने को राजी हो गया। फिर दोनों भाई इधर-उधर देखते हुए एक साथ अपने घर से बाहर निकल पड़े। घूमते-घूमते वे दोनों भाई एक मकान के अन्दर घुसे तो देखा कि आंगन में एक रोटी पड़ी है। चिंटू ने झट से रोटी को उठाया और वे दोनों मकान से बाहर आ गए। बाहर आकर चिंटू ने रोटी के दो टुकड़े किए। उसने एक टुकड़ा अपने पास रख लिया और एक अपने भाई पिंटू को दे दिया। पिंटू बोला, चिंटू भैया, तूने रोटी का बड़ा टुकड़ा रखा है और मुझे छोटा टुकड़ा दिया है। चिंटू ने कहा, नहीं छोटे-बड़े नहीं हैं, दोनों टुकड़े बराबर हैं। पिंटू बोला, अच्छा दोनों टुकड़े बराबर हैं तो तुम अपने वाला टुकड़ा मुझे दे दो और मेरे हिस्से वाला तुम रख लो। चिंटू गुस्से से बोला, नहीं देता मैं। रोटी तो मैं ही उठाकर लाया था घर से। अब छोटा-बड़ा करके शोर क्यूं करता है ? चिंटू का गुस्सा देखकर पिंटू को भी गुस्सा आ गया। उसने अपने हिस्से की रोटी का टुकड़ा चिंटू की तफ फेंक दिया और चिंटू के हिस्से का टुकड़ा ज्योंही पिंटू ने छीनना चाहा तो चिंटू सतर्क हो गया। उसने पिंटू को जोर से चांटा लगा दिया। लड़ाई-झगड़े में पिंटू भी कम नहीं था। उसने भी चिंटू को जोर से झापड़ मारा। दोनों भाई अपस में गुत्थम-गुत्था हो गए। पास ही पेड़ पर एक बंदर बैठा दोनों भाइयों की लड़ाई देख रहा था। वह झट से पेड़ से नीचे उतरा और चिंटू-पिंटू से बोला, बच्चों…..आपस में क्यों झगड़ रहे हो ? चिंटू बोला, बंदर चाचा, झगड़ा तो पिंटू करता है। जब मैंने रोटी के बराबर-बराबर दो हिस्से कर इसे दिया तो यह छोटा-बड़ा कहकर मुझसे लड़ने लगा। बंदर बोला, ऐसा करो….. ये दोनों टुकड़े इधर लाओ मेरे पास। चिंटू ने झटपट जमीन पर पड़े रोटी के दोनों टुकड़ों को उठाया और बंदर को दिखाते हुए बोला, देखो बंदर चाचा, ये टुकड़े हैं दोनों। आपको इन दोनों में से कौन सा छोटा और कौन सा बड़ा लगता है ? बंदर अपने माथे पर हाथ रखता
हुआ बोला, बच्चो, ऐसे कैसे पता चलेगा ? ये दोनों टुकड़े पहले मुझे दो। अगर ये छोटे-बड़े हुए तो मैं तुम दोनों को बराबर करके दे दूंगा। बंदर की बात सुनकर पिंटू चौंका और वह चिंटू से बोला, चिंटू भैया, रोटी के ये दोनों टुकड़े बंदर चाचा के हाथ में मत देना। नहीं तो अपने दोनों भाई भूखे ही रह जाएंगे। तूने मम्मी से वो दो बिल्लियों का झगड़ा और बंदर वाली कहानी नहीं सुनी थी क्या ? चिंटू भैया, दोनों टुकड़े बराबर ही हैं। मैं अब कभी नहीं झगड़ूंगा। अच्छा तो ये बात है। क्यूं बंदर चाचा, हम दोनों भाइयों को तुम ठगने की कोशिश कर रहे थे ना। अब वो जमाना लद गया चाचा। चिंटू ने इतना कहकर रोटी का एक टुकड़ा पिंटू के हाथ में
थमा दिया और वे दोनों भाई अपने घर की तरफ चल दिए। बंदर अपना सा मुंह लेकर रह गया और छलांग लगाता हुआ वापस पेड़ पर चढ़ गया।

साक्षरता पर स्लोगन –  Literacy on Slogan

भारत में साक्षरता 8 सितंबर को दुनिया भर में मनाया जाता हैं ।

जहाँ साक्षरता होगी पूरी, उस राष्ट्र की प्रगति होगी पूरी पूरी।

साक्षरता बढ़ाइए, दुनियाँ को प्रगति के रास्ते ले जाईये ।

यूनेस्को का एहलान, निरक्षर रहे न कोई इंसान ।

साक्षर होंगे धरती पर सभी इंसान, तभी धरती होगी स्वर्ग समान ।

 

भारत साक्षरता मिशन , सामाजिक और आर्थिक विकास में साक्षरता की भूमिका – Bharat Sakshrta Mission

भारतीय साक्षरता एक मानव अधिकार है, सशक्तिकरण का मार्ग है और समाज तथा व्‍यक्ति के विकास का साधन है। शिक्षा के अवसर साक्षरता पर निर्भर करते हैं। गरीबी उन्‍मूलन के लिए, बाल मृत्‍युदर को कम करने के लिए, जनसंख्‍या वृद्धि को नियंत्रण में रखने के लिए, स्‍त्री-पुरुष में समानता को बढ़ावा देने के लिए तथा सतत विकास, शांति और लोकतंत्र की सुनिश्चितता के लिए साक्षरता आवश्‍यक है।

1966 से 8 सितंबर का दिन अंतर्राष्‍ट्रीय साक्षरता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्‍य व्‍यक्तियों, समुदायों और समाजों में साक्षरता में महत्‍व का प्रचार करना है। इस वर्ष का अंतर्राष्‍ट्रीय दिवस ”21वीं शताब्‍दी के लिए साक्षरता” को समर्पित है। इसका उद्देश्‍य सभी के लिए बुनियादी साक्षरता कौशलों की आवश्‍यकता तथा सभी को अधिक उन्‍नत साक्षरता कौशलों में प्रशिक्षण देना है, ताकि वे जीवन पर्यन्‍त शिक्षा ग्रहण कर सकें।
हमारी राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा की भूमिका और महत्‍व को दर्शाया गया है और वह आज भी प्रासंगिक है। इसमें कहा गया है कि शिक्षा सभी के लिए जरूरी है और हमारे चहुंमुखी विकास का मूल आधार है। शिक्षा से अर्थव्‍यवस्‍था के विभिन्‍न स्‍तरों के लिए मानव शक्ति को विकसित किया जाता है और यह एक ऐसा मंच है, जिससे अनुसंधान और विकास आगे बढ़ता है, जो राष्‍ट्र को स्वावलंबन की दिशा में ले जाता है। सारांश में शिक्षा, वर्तमान और भविष्‍य के लिए एक अद्वितीय निवेश है।

पिछले एक दशक में भारत में साक्षरता की दर काफी बढ़ी है। विशेष रूप से गांवों में नि:शुल्‍क शिक्षा लागू होने के बाद हिमाचल प्रदेश और राजस्‍थान में साक्षरता की दर काफी ज्‍यादा हो गई है। भारत जैसे देश में  सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए साक्षरता मूल आधार है। 1947 में भारत में ब्रिटिश शासन की समाप्ति के समय साक्षरता दर केवल 12 प्रतिशत थी। उसके बाद के वर्षों में भारत में सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक दृष्टि से बदलाव आया है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत पाई गई। हालांकि कि यह बहुत बड़ी उपलब्‍धि है, लेकिन यह चिंता की बात है कि अभी भी भारत में
इतने ज्‍यादा लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते। जिन बच्‍चों को शिक्षा नहीं मिली है, विशेष रूप से ग्रामीण इलाक़ों में, उनकी संख्‍या बहुत ज्‍यादा है। हालांकि सरकार ने कानून बनाया है कि 14 वर्ष से कम उम्र के हर बच्‍चे को नि:शुल्‍क शिक्षा मिलनी चाहिए, फिर भी निरक्षरता की समस्‍या बनी हुई है।

अगर हम भारत में महिला साक्षरता की दर को देखें, तो यह पुरुष साक्षरता दर से कम बैठती है क्‍योंकि माता-पिता अपनी लड़कियों को स्‍कूल जाने की अनुमति नहीं देते, बल्कि छोटी उम्र में ही उनकी शादी कर दी जाती है। हालांकि बाल-विवाह की उम्र काफी कम कर दी गई है, लेकिन फिर भी बाल-विवाह होते है। जनगणना 2011 की साक्षरता दर के अनुसार आज महिलाओं में साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है और पुरुषों में साक्षरता दर 80 प्रतिशत से अधिक है। भारत में साक्षरता दर हमेशा चिंता का विषय रही है, लेकिन बड़ी संख्‍या में स्‍वयंसेवी संगठनों के प्रयासों और सरकार के विज्ञापनों, अभियानों और अन्‍य कार्यक्रमों से
लोगों में साक्षरता के महत्‍व के बारे में जागरूकता पैदा की जा रही है। सरकार ने महिलाओं के समान अधिकारों के लिए भी कड़े नियम बनाएं है।पिछले 10 वर्षों में भारत में साक्षरता दर में पर्याप्‍त वृद्धि हुई है। केरल भारत का एक मात्र राज्‍य है, जहां साक्षरता दर 100 प्रतिशत है। उसके बाद गोवा, त्रिपुरा, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश, महाराष्‍ट्र और सिक्किम का स्‍थान आता है। भारत में सबसे कम साक्षरता दर बिहार में है।

साक्षरता के महत्‍व को समझते हुए भारत सरकार के विद्यालय शिक्षा और साक्षरता विभाग ने कई उपाय किए हैं, जैसे प्रारंभिक स्‍तर पर सभी बच्‍चों को नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना, शिक्षा के राष्‍ट्रीय और समग्र स्‍वरूप को लागू करने के लिए राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ भागीदार बनना, गुणवत्‍तापूर्ण विद्यालय शिक्षा और साक्षरता की सहायता से संवैधानिक मूल्‍यों के प्रति समर्पित समाज का निर्माण करना, गुणवत्‍तापूर्ण माध्‍यमिक शिक्षा के लिए सभी को अवसर उपलब्‍ध कराना तथा पूर्णरूप से साक्षर समाज का निर्माण करना।वर्ष 2010 में जब बच्‍चों के लिए नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा का कानून 2009 लागू हुआ, तो यह देश के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। सभी के लिए प्रारंभिक शिक्षा की दिशा में देश के प्रयासों को इस कानून के लागू होने से जबर्दस्त बढ़ावा मिला। इस कानून के उद्देश्‍यों को केंद्र सरकार के

निम्‍नलिखित कार्यक्रमों के माध्‍यम से प्राप्‍त किया जा रहा है:

  • · प्राथमिक स्‍तर पर सर्वशिक्षा अभियान और दोपहर का भोजन
  •  माध्‍यमिक स्‍तर पर राष्‍ट्रीय माध्‍यमिक शिक्षा अभियान और मॉडल स्‍कूल
  • व्यावसायिक शिक्षा, छात्राओं के लिए होस्‍टल और विकलांगों के लिए समावेशी शिक्षा
  • प्रौढ़ शिक्षा के लिए साक्षर भारत कार्यक्रम
  • महिला शिक्षा के लिए महिला समाख्‍या
  • अल्‍पसंख्‍यक संस्‍थाओं का ढाँचागत विकास, अल्‍पसंख्‍यकों की शिक्षा के लिए मदरसों में गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की योजना

साक्षरता के नारे : National Literacy 0f India

  • .सुनहरे भारत का सपना,
    जरुरी हो सबका पढ़ना.
  •  विकास का होगा सुगम रास्ता,
    जब जन-जन में फैले साक्षरता.
  • आओ बढायें इस समाज का मान ,
    देकर हर व्यक्ति को अक्षर ज्ञान.
  • साक्षर समाज हो जब पहली शर्त,
    समस्या समाधान हो पर्त दर पर्त.
  • सुंदर होगा हमारा कल और आज,
    हर सर जब पहने साक्षरता का ताज
  • समाज का बढाओ तुम मान,
    देकर हर बच्चे को अक्षर ज्ञान
  • अगर देश को है प्रगति की चाह,
    हर कदम बढे साक्षरता की राह
  • गंवाया जिसने अक्षर ज्ञान का मौक़ा,
    खाता रहेगा वह हर राह पर धोखा
  • आएगी जन-जन में जागरूकता,
    हासिल होगी जब सर्वसाक्षरता
  • अक्षर-ज्ञान के दो शब्द है एक मजबूत यन्त्र,
    इसमें समाया “अ”से” ज्ञ” तक का अद्भुत मंत्र

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण : National Literacy Mission Authority

प्रौढ़ शिक्षा केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों दोनों के साथ समवर्ती विषय है। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर राष्‍ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण (एन एल एम ए), जो मा. सं. वि. मं. का एक स्‍वायत्तशासी खंड है, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों और संस्‍थानों के समग्र नियोजन एवं प्रबंधन तथा वित्तपोषण की शीर्ष एजेंसी है। इनके अतंर-मंत्रालयीय आम परिषद और कार्यपालक समिति दो नीति एवं कार्यपालक निकाय हैं।

वर्तमान में प्रौढ़ शिक्षा का प्रावधान साक्षर भारत कार्यक्रम (एस बी पी) के जरिए है, जो केन्‍द्र प्रायोजित स्‍कीम है। राष्‍ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण राष्‍ट्रीय स्‍तर की शीर्ष एजेंसी है। संयुक्‍त सचिव (प्रौढ़ शिक्षा) एन एल एम ए के पदेन महासचिव हैं। इसकी स्‍थापना 1988 में मंत्रिमंडल के अनुमोदन से मानव संसाधन विकास मंत्रालय(तत्‍कालीन शिक्षा विभाग) के स्‍वतंत्र और स्‍वायत्तशासी खंड के रूप में की गई थी। मंत्रिमंडल ने कार्य के क्षेत्र में एन एल एम ए को पूर्ण कार्यपालक और वित्तीय शक्तियां प्रदान कीं।

साक्षरता मिशन पर कविता /Literacy Mission on Poem/Sakshrta Mission par Kavita

हमारे मुल्क़ की सड़कोँ पे ये मन्ज़र निकलते है
सियासी शक्ल मेँ अब मौत के लश्कर निकलते है

मेरे दुश्मन तो हँसकर फेँकते हैँ फूल अब मुझ पर
मगर कुछ दोस्तोँ की ज़ेब से पत्थर निकलते है

चली हैँ कौन सी जाने हवायेँ अब के गुलशन मे
यहाँ शाख़ोँ पे अब कलियाँ नहीँ ख़न्जर निकलते है

हमेँ मालूम है अब उस दरीचे मेँ नहीँ है तू
मगर फिर भी तेरे कूचे से हम अक्सर निकलते है

मसीहा ठीक कर सकता है तू ऊपर के ज़ख़्मोँ को
कई फोड़े भी हैँ जो रुह के अन्दर निकलते हैँ

हमारे सामने कल तक जिन्हेँ चलना न आता था
हमारे सामने ही आज उनके पर निकलते है

खबर पहुँची है मेरी मुफ़लिसी की जब से कानोँ मे
मेरे हमदर्द सब मुझसे बहुत बचकर निकलते है

हमेँ अच्छा-बुरा यारोँ यही दुनियाँ बनाती ह
दरिन्दे कोख से माँ की कहीँ बनकर निकलते है

ज़ुबाँ मेँ शहद है जिनकी बदन हैँ फूल के जैसे
परख कर देखिये तो दिल से सब पत्थर निकलते है ||

प्रेरक साक्षरता अभियान : Prerk Sakshrta Mission

शिक्षा प्रेरक खुले में शौच न जाने को करेंगे प्रेरित- प्रेरक ग्राम पंचायत स्तर पर साक्षरता अभियान की पहल करेगे | और गाँव गाँव जाकर सभी लोगों को ये सूचित करेगे की हमे खुले में सोच नही करना चहिये ,क्योंकि खुले में सोच करने से आस पास का वातावरण दूषित हो जाता हैं जिससे हमे और हमारे बच्चो को कई तरह की जान लेवा बीमारियों का सामना करना पड़ता हैं | इन सब से बचने के लिए हमे शोचालयों का निर्माण करवाना चाहिए ,जिससे हम एक स्वस्थ जीवन जी सके |

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