December 9, 2016
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पशुपालन की परिभाषा – Definition of pasupalan

पशुपालन कृषि विज्ञान का वह भाग है| जिसके अंतर्गत कृषि के साथ साथ पशुओं को भी पालना व विभिन पक्षों जैसे भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य, प्रजनन आदि का अध्ययन करना पशुपालन कहलाता है|

पशुपालन का इतिहास – History of pasupalan

पशुओं को पालने का इतिहास सभ्यता के अवस्थांतर को दर्शाता है जहां समुदायों ने शिकारी-संग्राहक जीवन शैली से कृषि की ओर जाकर स्थिर हो जाने का निर्णय लिया। तथा पशुओं को पालतू कहा | जब उनका प्रजनन तथा जीवन अवस्थाएं मनुष्यों के द्वारा संचालित होने लगी व समय के साथ, पशुधन का सामूहिक व्यवहार, जीवन चक्र, तथा शरीर क्रिया विज्ञान के मौलिक रूप से बदल गया है। कई आधुनिक फ़ार्म पशु अब जंगली जीवन के लिए अनुपयुक्त हो चुके हैं। कुत्तों को पूर्वी एशिया में लगभग 15,000 वर्ष पूर्व पालतू बनाया गया था, बकरियां तथा भेड़ें लगभग 8000 वर्ष ईपू एशिया में पालतू बनायीं गयी थीं। शूकर अथवा सूअर 8000 वर्ष ईपू पहले मध्य एशिया व चीन में पालतू बनाये गए थे। घोड़े को पालतू बनाये जाने के सबसे प्राचीन प्रमाण लगभग 4000 ईपू से समय से प्राप्त होते हैं।

प्राचीन अंग्रेजी स्रोत, जैसे बाइबल के किंग जेम्स संस्करण, में पशुधन को “कैटल” (मवेशी) द्वारा इंगित किया जाता है न कि “डीयर” (हिरन) के द्वारा, इस शब्द का प्रयोग ऐसे जंगली पशुओं के लिए किया जाता था जो किसी के स्वामित्व में नहीं होते थे। शब्द कैटल की उत्पत्ति मध्यकालीन अंग्रेजी शब्द चैटल से हुई है, जिसका अर्थ सभी प्रकार की व्यक्तिगत चल संपत्तियों से है, जिसमें पशुधन सम्मिलित है, तथा जो अचल भूमि-संपत्ति से अलग है बाद में अंग्रेजी में, कभी-कभी छोटे पशुधन को “स्माल कैटल” भी कहा जाता था तथा जिसका
चल-संपत्ति अथवा भूमि के अभिप्राय में प्रयोग होता था तथा जो भूमि के क्रय अथवा विक्रय किये जाने पर स्वतः ही हस्तांतरित नहीं हो जाती थी। आज, शब्द “मवेशी” का अर्थ, बिना किसी विशेषक के, आमतौर से पालतू गोवंशीय पशु होता है बॉस वर्ग की अन्य प्रजातियों को कभी कभी जंगली मवेशी कहा जाता है।

pasudhan vibhag

पशुओं के आर्थिक मूल्य के रूप में शामिल किया गया है| जैसे pasuo ka Aarthik moolay

मॉस आहार का उपयोगी प्रोटीन तथा ऊर्जा का उत्पादन
डेयरी उत्पाद = स्तनधारी पशुधन का प्रयोग दूध के स्रोत के रूप में होता है, जिसे आसानी से संसाधित करके अन्य डेयरी उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे दही, चीज़, मक्खन, आइस क्रीम, केफीर अथवा क्यूमिस. पशुधन का प्रयोग इस कारण से किये जाने से  प्राप्त भोजन ऊर्जा उन्हें काटने से प्राप्त ऊर्जा से कई गुना अधिक होती है।
रेशा (फाइबर)= पशुधन से रेशों/वस्त्रों की एक श्रृंखला का उत्पादन होता है। उदाहरण के लिए भेड़ों तथा बकरियों से ऊन तथा मौहेर प्राप्त होता है; गाय, हिरन तथा भेड़ की खाल से चमड़ा बनाया जाता है; तथा इनकी हड्डियों, खुरों तथा सींगों का भी प्रयोग किया जा सकता है।
उर्वरक = गोबर की खाद का प्रयोग फसल की खेतों में डाल कर उनकी पैदावार को बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण कारण है जिससे ऐतिहासिक रूप से पौधे तथा पालतू पशु एक दूसरे से महत्वपूर्ण रूप से जुड़े हुए हैं। गोबर की खाद का प्रयोग दीवालों तथा फर्शों के प्लास्टर में तथा आग जलाने की ईंधन के रूप में भी किया जा सकता है। पशुओं के रक्त हड्डियों का प्रयोग भी उर्वरक के रूप में किया जाता है।
श्रम= घोड़े, गधे तथा याक जैसे पशुओं का प्रयोग यांत्रिक ऊर्जा के लिए किया जा सकता है। भाप की शक्ति से पहले, पशुधन गैर-मानव श्रम का एकमात्र उपलब्ध स्रोत था। इस उद्देश्य के लिए वे आज भी विश्व के कई भागों में प्रयोग किये जाते हैं, जैसे खेत जोतने के लिए, सामान ढुलाई के लिए तथा सैन्य प्रयोग के लिए भी.
भूमि प्रबंधन= पशुओं की चराई को कभी कभी खर-पतवार तथा झाड-झंखाड़ के नियंत्रण के रूप में प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां जंगल की आग लगती है, बकरियों तथा भेड़ों का प्रयोग सूखी पत्तियों को खाने के लिए किया जाता है जिससे जलने योग्य सामग्री कम हो जाती है तथा आग का खतरा भी कम हो जाता है।

पशुपालन का इतिहास History of Pasupalan

पशु पालन के इतिहास के दौरान, ऐसे कई उत्पादों का विकास किया गया जिससे उनके कंकालों का प्रयोग किया जा सके तथा कचरे को कम किया जा सके. उदाहरण के लिए, पशुओं आतंरिक अखाद्य अंग, तथा अन्य अखाद्य भागों को पशु भोजन तथा उर्वरक में बदला जा सकता है। अतीत में, इस तरह के अपशिष्ट उत्पादों को कभी-कभी पशुओं के भोजन के रूप में भी खिलाया गया है। हालांकि, अंतर-प्रजाति पुनर्चक्रण बीमारियों का खतरा प्रस्तुत करता है, जिससे पशु एवं यहां तक कि मनुष्य भी खतरे में आ जाते हैं (बोवाइन स्पौंजीफॉर्म एंकेफैलोपैथी
(बीएसई), स्क्रैपी व प्रायन देखें). मुख्य रूप से बीएसई (मैड काऊ डिज़ीज़) के कारण पशु अवशिष्ट को पशुओं को खिलाया जाने पर अनेक देशों में रोक लगा दी गयी है, कम से कम जुगाली करने वाले पशुओं तथा सूअरों पर तो यह रोक है ही.

पशुपालन के बारे में परिचय  introduction about Animal husbandry

भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुपालन का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। जिसमे देश की लगभग 70% आबादी कृषि एवं पशुपालन पर आधारित है। छोटे व सीमांत किसानों के पास कुल कृषि भूमि की 30% भूमि है। इसमें 70% कृषक पशुपालन व्यवसाय से जुड़े है जिनके पास कुल पशुधन का 80% भाग मौजूद है। स्पष्ट है कि देश का अधिकांश पशुधन, आर्थिक रूप से निर्बल वर्ग के पास है। भारत में लगभग 19.91 करोड़ गाय, 10.53 करोड़ भैंस, 14.55 करोड़ बकरी, 7.61 करोड़ भेड़, 1.11 करोड़ सूकर तथा 68.88 करोड़ मुर्गी का पालन किया जा रहा है।
भारत 121.8 मिलियन टन दुग्धउत्पादन के साथ विश्व में प्रथम, अण्डा उत्पादन में 53200 करोड़ के साथ विश्व में तृतीय तथा मांस उत्पादन में सातवें स्थान पर है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र में जहाँ हम मात्र 1-2 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त कर रहे हैं वहीं पशुपालन से 4 -5 प्रतिशत। विश्व में हमारा स्थान बकरियों की संख्या में दूसरा, भेड़ों की संख्या में तीसरा एवं कुक्कुट संख्या में सातवाँ है। इस तरह पशुपालन व्यवसाय में ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करने तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को ऊँचा उठाने की अपार सम्भावनायें हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का महत्व Importance role of agriculture and Economics

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का विशेष महत्व है। सकल घरेलू कृषि उत्पाद में पशुपालन का 28-30% का योगदान सराहनीय है जिसमें दुग्ध एक ऐसा उत्पाद है जिसका योगदान सर्वाधिक है। भारत में विश्व की कुल संख्या का 15% गायें एवं 55% भैंसें है और देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 53% भैंसों व 43% गायों से प्राप्त होता है। भारत लगभग 121.8 मिलियन टन दुग्ध उत्पादन करके विश्व में प्रथम स्थान पर है जो कि एक मिसाल है और उत्तर प्रदेश राज्य इसमें अग्रणी है। यह उपलब्धि पशुपालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे
मवेशियों की नस्ल, पालन-पोषण, स्वास्थ्य एवं आवास प्रबंधन इत्यादि में किए गये अनुसंधान एवं उसके प्रचार-प्रसार का परिणाम है। लेकिन आज भी कुछ अन्य देशों की तुलना में हमारे पशुओं का दुग्ध उत्पादन अत्यन्त कम है और इस दिशा में सुधार की बहुत संभावनायें है।

पशुपालन के कार्य Works of pasupalan

वर्ष के विभिन्न महीनों जैसे दिसम्बर व जनवरी एवं फरवरी में पशुपालन से सम्बन्धित कार्य इस प्रकार हैं-

1. पशुओं का ठंड से बचाव करें, परन्तु झूल डालने के बाद आग से दूर रखें।
2. बरसीम की कटाई करें।
3. वयस्क तथा बच्चों को पेट के कीड़ों की दवा पिलायें।
4. खुरपका-मुँहपका रोग का टीका लगवायें।
5. सूकर में स्वाईन फीवर का टीका अवश्य लगायें।
6. दुहान से पहले अयन को गुनगुने पानी से धो लें
7. उत्पन्न संतति का विशेष ध्यान रखें
8. बाह्य परजीवी तथा अन्तः परजीवी की दवा पिलवायें।
9. कृत्रिम गर्भाधान करायें।
10.खुरपका-मुँहपका का टीका लगवाकर पशुओं को सुरक्षितकरें।
11.जिन पशुओं में जुलाई अगस्त में टीका लग चुका है, उन्हें पुनः टीके लगवायें।

कृषि नीतियां और योजनाएं Policies and schemes of agriculture

कृषि से संबंधित नीतियों और योजनाओं, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, ग्रामीण विकास आदि की जानकारी प्रदान करता है।

कृषि आधारित उद्योग agriculture based enterprises

इसके अंतर्गत तेजी से लोकप्रिय हो रहे और बड़े पैमाने पर अपनाए जाने वाले उद्योग जैसे मशरुम की खेती,मधुमक्खी पालन आदि की जानकारी को प्रस्तुत कर इस क्षेत्र से जुड़े लोगों के सामान्य सवालों के जवाब प्रस्तुत करने की एक कोशिश है।

फसल उत्पादन संबधित जानकारी Informatoin of Crop Prodacation

यह भाग फसल उत्पादन की महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है। इसके साथ कृषि उत्पादन और उत्पादन उपरांत के चरण में लाभ देने
वाली उपयोगी नवीनतम प्रौद्योगिकी, कृषि आदान, कृषि उपकरण, मौसम, विपणन आदि के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

पशुधन पर पर्यावरणीय समस्या Enviroment problem on pasudhan

शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट “लाइवस्टॉक्स लौंग शैडो” जैसी रिपोर्टों से पशुधन क्षेत्र मुख्य रूप से मवेशी, मुर्गीपालन, तथा सूअर पर संकट आया, क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार यह क्षेत्र सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं के सर्वाधिक बड़े दो या तीन अंशदाताओं में से एक माना गया था। संयुक्त राष्ट्र ने अपनी कार्यप्रणाली में वनों की कटाई से उत्पन्न उत्सर्जन को शामिल किया था। 18% आंकड़े के स्थान पर, जो इस क्षेत्र के लिए उत्सर्जन के बड़े अंशदाता के रूप में निर्धारित किया गया है, एक वास्तविक आंकड़ा है, वनों की कटाई दरअसल 12% है
अप्रैल 2008 में संयुक्त राज्य में उत्सर्जन के प्रमुख स्टॉकटेक जारी किये जिसका शीर्षक इन्वेंटरी ऑफ यूं.एस. ग्रीनहाउस गैस एमिशन्स एंड सिंक्स: 1990-2006 था 2006 में कृषि क्षेत्र 454.1 टेराग्राम्स के समतुल्य (Tg CO2 Eq.), CO2 के उत्सर्जन, अथवा संयुक्त राज्य के कुल ग्रीनहाउस गैसों के 6 प्रतिशत का जिम्मेदार पाया गया।” तुलना करने की दृष्टि से, संयुक्त राज्य में कुल उत्सर्जन का 25% परिवहन से प्राप्त होता है।

केंद्र सरकार की पशुधन नीति Policies and schemes of  Central Government

पशुधन के नीति के केंद्र में रहने का मुद्दा अभी जीवित है, विशेष रूप से नियोट्रॉपिकल क्षेत्रों में वनों की कटाई, भूमि की दुर्दशा, जलवायु परिवर्तन व वायु प्रदूषण, पानी की कमी व जल प्रदूषण तथा जैव विविधता की कमी. होक्केदो स्थित ओबिहिरो यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड वेट्रीनरी मेडिसिन के एक शोध दल ने पाया कि पशु के भोजन में सिस्टीन, जो कि एक प्रकार का अमीनो एसिड है, तथा नाइट्रेट शामिल करने से उनके द्वारा पैदा की जाने वाली मीथेन गैस की मात्र में कमी लायी जा सकती है, तथा साथ ही मवेशी की उत्पादकता अथवा मांस
व दूध की गुणवत्ता भी प्रभावित नहीं होती.

वनों की कटाई से नुकसान Effects of Deforestation

वनों की कटाई वनों की कटाई कार्बन चक्र को प्रभावित करती है और साथ ही कई प्रजातियों के प्राकृतिक निवास की हानि का कारण बनती है। वन, जो कि कार्बन चक्र के लिए सिंक का कार्य करते हैं, कटाई के कारण खोते जा रहे हैं। वनों को या तो काटा जा रहा है अथवा इन्हें जला कर समतल भूमि बनायीं जा रही है, क्षेत्र के लिए आवश्यक समय विस्तृत है। वनों की कटाई से भी खंडन होता है, प्रजातियों के लिए उनका प्राकृतिक निवास खण्डों में मिल पता है। अगर ये खंड दूर और छोटे हों तो जीन प्रवाह कम हो जाता है, प्राकृतिक निवास परिवर्तित हो जाता है, किनारे प्रभावित होते हैं और आक्रामक प्रजातियों के आक्रमण के लिए अवसर अधिक होता है।

वनों की कटाई से जलवायु  में परिवर्तन  Environment Effects of Deforestation

जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण मीथेन पशुधन खाद से उत्सर्जित गैसों में से एक है; यह लंबी अवधि तक बनी रहती है और एक ग्रीन हाउस गैस है। कार्बन डाइऑक्साइड के पश्चात यह दूसरी सबसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध ग्रीन हाउस गैस है। हालांकि मीथेन कार्बन डाइ ऑक्साइड है कम मात्रा में है, वातावरण को गर्म करने की इसकी क्षमता 25 गुना अधिक है।

पशुधन के लिए पानी की आवश्यकता  water require for pasudhan

पशुधन की खपत के लिए पानी की आवश्यकता होती है परन्तु भोजन के लिए जल ड्रॉप्स की भी आवश्यकता होती है। पशुधन को अक्सर अनाज खिलाया जाता है, जिसमें अमेरिका में उत्पन्न होने वाला 50% अनाज शामिल है साथ ही विश्व भर में होने वाला 40% अनाज भी शामिल है।अनाज तथा अन्य फसलों के उत्पादन के लिए भी जल की अलग-अलग मात्राओं की आवश्यकता होती है, अनाज से उत्पन्न एक किलोग्राम बीफ के लिए 100,000 लीटर जल की आवश्यकता पड़ती है, गेहूं से तुलना करने पर यह मात्रा 900 लीटर होती है

गोबर पर आधारित खादों से जल का प्रदूषण  Dung water pollution based on fertilizers

जल प्रदूषण पशुओं के गोबर पर आधारित खादों की सहायता से उगाई जाने वाली फसलें (जैसे अन्न तथा चारा) जिनमें फॉसफोरस तथा नाइट्रोजन होता है, जिनका लगभग 95% वातावरण में नष्ट हो जाता है। तब प्रदूषक तत्व पौधों तथा जलीय जंतुओं के लिए मृत क्षेत्र बना देते हैं क्योंकि पानी में ऑक्सीज़न का आभाव होता है। ऑक्सीजन के आभाव को यूट्रोफिकेशन के नाम से जाना जाता है, जिसमें जल में उपस्थित जीवधारी अत्यधिक बढ़ जाते हैं तथा उसके पश्चात ऑक्सीजन का प्रयोग करते हुए सड़ जाते हैं। इसका सबसे प्रमुख उदाहरण मैक्सिको की खाड़ी है, जहां उर्वरकों में मौजूद पोषक तत्वों के अत्यधिक उपयोग से वे मिसिसिपी नदी से होकर खाड़ी में पहुंच गए तथा वहां बहुत बड़े मृत क्षेत्र बन गए। अन्य प्रदूषक, हालांकि ये अधिक है, एंटीबायोटिक दवायें तथा हार्मोन हैं। दक्षिणी एशिया में जिन गिद्धों ने पशुधन के मृत शरीरों को खाया, उनकी संख्या 95% तक कम हो गयी और इसका कारण डिक्लोफेनैक नामक एंटीबायोटिक थी अर्ध शुष्क परिक्षेत्रों में, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के ग्रेट प्लेन्स, में ऐसी शोध हुई हैं जिनसे यह पता लगता है कि घास के मैदानों के प्राकृतिक
आवास को संरक्षित करने में पशुधन उपयोगी हो सकता है। पशुधन प्राकृतिक आवास का निर्माण तथा उनकी को बड़ी प्रजातियों के लिए बनाये रख सकते हैं

पशुपालन में रोज़गार  Employment in  Animal husbandry

भारत में प्रमुख शिक्षण संस्थान
1.कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
2.गुरु अंगददेव वैटरिनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी, लुधियाना (पंजाब)
3.शेर-ए-कश्मीर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, जम्मू-कश्मीर
4.गोविंद बल्लभ पंत एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, पंतनगर(उत्तराखंड)
5. राजस्थान एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, बीकानेर (राजस्थान)
6. लाला लाजपत राय वैटरिनेरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी, हिसार(हरियाणा)
7. तमिलनाडु वैटरिनरी एंड फिशरीज यूनिवर्सिटी

पशुपालन में क्यों अपनाएं कैरियर Why carry out career in animal husbandry

दरअसल पशुपालन के व्यवसाय के तौर पर उभरने के कई कारण हैं। लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आने से आज सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी दुग्ध उत्पादों की मांग बढ़ी है। तेजी से आगे बढ़ रहे इस कारोबार को ऊपर उठाने की एक वजह दुग्ध उत्पादों की कीमतों का बढ़ना है। इसके अलावा इस धंधे में तरक्की की काफी संभावनाएं हैं। प्राकृतिक आपदा छोड़कर इस कारोबार को हमेशा फायदा ही मिलता है

पशुपालन में अवसर कहां-कहां है| where and where opportunity in Animal husbandry

रोजगार के लिहाज से पशुपालन का दायरा बहुत ही विस्तृत है। पशुपालन विभाग, रिमाउंट वैटरिनरी कोर(सेना), पैरा मिलिट्री फोर्सेस, फार्मास्यूटिकल कंपनीज, डेयरी एंड मीट इंडस्ट्री, पेंटरी इंडस्ट्री, विश्वविद्यालय में शोध और अध्यापन आदि क्षेत्रों में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। स्वरोजगार अपनाकर भी इस क्षेत्र में अच्छी आमदनी अर्जित की जा सकती है।

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