December 7, 2016
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दही हांडी के लिय 20 फीट का मानव पिरामिड ही हो सुप्रीम कोर्ट

दही हांडी के लिय 20 फीट का मानव पिरामिड ही हो सुप्रीम कोर्ट

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महाराष्ट्र में दही हांडी के लिय 20 फीट से ऊंचा मानव पिरामिड नहीं होना चाहिया सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन धूमधाम से मटकी फोड़ने वाले दही-हांडी यानी गोविंदा त्यौहार से ठीक सप्ताह भर पहले ऐसा फ़ैसला दे दिया कि सदियों पुरानी बेहद रोमांचक और लोकप्रिय गोविंदा परंपरा का अस्तित्व ही संकट में दिखने लगा है। ज़ाहिर सी बात है, इस त्यौहार को सही मायने में मनाने वाले जेनुइन लोग निराश हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस बात पर बहस भी छिड़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट की दही-हांडी पर सख़्ती कहीं भारतीय संस्कृति पर हमला तो नहीं है?

पिरामिड की उंचाई 20 फुट तक सीमित करने के लिए परिपत्र
अपने फ़ैसले में देश की सबसे बड़ी अदालत नें साफ़ कर दिया कि मटकी फोड़ने के लिए बनाए जाने वाले पिरामिड में 18 साल से कम उम्र के बच्चे हिस्सा नहीं ले सकेंगे और न ही मटकी की ऊंचाई 20 फीट से ज़्यादा होगी। लब्बोलुआब यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के पिछले साल के फ़ैसले को ही बरकरार रखा है।पिछले साल बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐसे इंतज़ामात करने के निर्देश दिए थे, जिन पर अमल करना मुश्किल भरा ही नहीं, क़रीब-क़रीब असंभव है। मसलन, हाईकोर्ट ने कहा था कि मटकी-स्थल के आसपास ज़मीन पर गद्दे बिछाए जाएं। चूंकि गोविंदा पर्व बारिश में पड़ता है, ऐसे में खुले आसमान के नीचे गद्दे नहीं बिछाए जा सकते। इससे गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है। यह आयोजकों के लिए भी व्यवहारिक नहीं। हाईकोर्ट ने गोविंदाओं के लिए सुरक्षात्मक कवच और हेलमेट का इंतज़ाम करने और मटकी सड़क या रास्ते पर न टांगने की भी निर्देश दिया था। यह भी व्यवहारिक नहीं था। लिहाज़ा, इन आदेशों का पालन करना बहुत ही मुश्किल भरा होगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस फ़ैसले को ओके कर दिया।

पिछले साल सबसे पहले मुंबई पुलिस के तत्कालीन प्रमुख राकेश मारिया ने बच्चों का सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 12 साल उम्र तक के बच्चों के दही-हांडी के पिरामिड में भाग लेने पर रोक लगा दी थी। मुंबई के पुलिस प्रमुख ने यह क़दम बाल मज़दूरी उन्मूलन के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के दबाव में उठाया था। यहां तक तो थोड़ी खैरियत थी, लेकिन रही सही कसर अदालत के आदेश ने पूरी कर दी। ऐसे में राज्य सरकार को निर्देश दिया जाना चाहिए कि गोविंदा को कॉमर्शियलाइज़ेशन बनाने से रोका जाए, न कि इस पर अव्यवहारिक बंदिशे लगाकर। लिहाजा देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई स्‍तर पर स्‍वागत योग्‍य भी है।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि दही-हांडी मूलतः बच्चों, किशोरों और नवयुवकों का ही का खेल रहा है। इस रोमांचकारी भारतीय परंपरा का आरंभ भगवान कृष्ण के बाल्यकाल में गोपियों की मटकी से माखन चुराने की घटनाओं से माना जाता है। बालक कन्हैया गोपियों की मटकी फोड़कर माखन चुरा लेते थे। बड़े होने पर श्रीकृष्ण ने मटकी नहीं फोड़ी, बल्कि वह कंस को मारने के लिए गोकुल को ही छोड़ दिया था। इस आधार पर कहा जा सकता है कि गोविंदा त्यौहार केवल और केवल बच्चों, किशोरों और नवयुवकों का ही है। इसमें बड़ों को शामिल नहीं होना चाहिए।
दही-हांडी की मटकी असल में सबसे ऊपर का बच्चा फोड़ता है। उसे पिरामिड में शामिल नवयुवक अपने कंधे पर बिठाकर सहारा देते हैं और मटकी तक पहुंचाते हैं, इसलिए यह कहने में कतई हर्ज़ नहीं कि इस त्यौहार का अट्रैक्शन ही बच्चे हैं। लिहाज़ा बच्चों की भागीदारी के बिना यह अधूरा सा लगेगा। इसमें केवल वयस्क युवक ही भाग लेंगे तब यह और जोख़िम भरा हो सकता है। 18 साल का होते-होते औसत इंसान का वज़न 60 किलोग्राम पार कर जाता है। अगर पिरमिड में सबसे ऊपर इतने वज़नदार व्यक्ति को चढ़ाया गया तो नीचे के गोविंदाओं के दबने का ख़तरा रहेगा।

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