अक्षय तृतीया आखातीज 28 अप्रैल से शुरू होंगे मांगलिक कार्य

अक्षय तृतीया आखातीज 28 अप्रेल 2017

भारत देश में जितना त्यौहारो का महत्व हैं उतना ही तिथियों का भी महत्व हैं हर हिंदी माह में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दो पक्ष होते हैं दोनों पक्षों में हर तिथि का महत्व होता हैं | लेकिन उनसे ज्यादा कही आखातीज का महत्व हैं अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।

अक्षय तृतीया अपने आप में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध महूर्त हैं इस तिथि को कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य बिना पंचाग के किया जा सकता हैं | जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं।वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। अक्षय तृतीया पर्व को कई नामों से जाना जाता है| इसे अखतीज और वैशाख तीज भी कहा जाता है| इसे सौभाग्य दिवस भी कहते हैं। इस तिथि का जहां धार्मिक महत्व है वहीं यह तिथि व्यापारिक रौनक बढ़ाने वाली भी मानी गई है। इस दिन स्वर्णादि आभूषणों की खरीद फरोख्त को बहुत ही शुभ माना जाता है। भारत कृषि प्रधान देश हैं इसी कारण आखातीज के दिन किसान अन्न देवता की पूजा करता हैं

स्वयंसिद्धमुहूर्त करेगा मनोरथ पूरे :

इसबार तृतीया पर स्वयंसिद्धि मुहूर्त है जो अनंत अक्षय फलदायक है। इस दिन जिसका भी परिणय संस्कार होगा उसका सौभाग्य अखंड रहेगा। महालक्ष्मी की विशेष पूजा से भी धन प्राप्ति का योग है। अक्षय तृतीया से शुरू होने वाला सावा सीजन 4 जुलाई को भगवान के देवशयन जाने पर थमेगा।

खेतीके लिए भी शुभ दिन : अक्षयतृतीया खेती के लिए भी अति शुभ मानी जाती है। इस दिन किसान फसल की बुवाई करना श्रेष्ठ मानते हैं। किसान अपने अनाज के भंडार भी भरते हैं। वहीं भगवान को नई फसल चना, दाल, कमल, ककड़ी के प्रसाद का भोग भी लगाते हैं। भारत देश में अक्षय तृतीया के दिन बाल विवाह बहुत ज्यादा होते हैं और इस तिथि से को अबूझ महूर्त के रूप में मानकर कोई भी कार्य किया जाता हैं अक्षयतृतीया से विवाह की शुरूआत होगी।

अक्षय तृतीया धार्मिक महत्त्व

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इसी दिन से त्रेता युग का आरंभ हुआ था। भगवान नारायण ने भी इसी दिन अवतार लिया था। भगवान परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ। प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बांके बिहारी जी के मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। अक्षय तृतीया को व्रत रखने और अधिकाधिक दान देने का बड़ा ही महात्म्य है। अक्षय तृतीया में सतयुग, किंतु कल्पभेद से त्रेतायुग की शुरुआत होने से इसे युगादि तिथि भी कहा जाता है। वैशाख मास में भगवान भास्कर की तेज धूप तथा लहलहाती गर्मी से प्रत्येक जीवधारी क्षुधा पिपासा से व्याकुल हो उठता है। इसलिए इस तिथि में शीतल जल, कलश, चावल, चना, दूध, दही आदि खाद्य व पेय पदार्थों सहित वस्त्राभूषणों का दान अक्षय व अमिट पुण्यकारी माना गया है। इस दिन श्रद्धा विश्वास के साथ व्रत रखकर जो प्राणी गंगा-जमुनादि तीर्थों में स्नान कर अपनी शक्तिनुसार देव स्थल व घर में ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ, होम, देव-पितृ तर्पण, जप, दानादि शुभ कर्म करते हैं, उन्हें उन्नत व अक्षय फल की प्राप्ति होती है।

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