31 अक्टूबर इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि जयंती दिवस जीवन परिचय राजनीतिक शासनकाल

हेलो दोस्तों 31 अक्टूबर का दिन महत्वपूर्णदिन माना जाता है इस दिन एक साथ 4 चार दिवस मनाया जाता है जिसमे इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि, सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती, संकल्प दिवस, राष्ट्रीय एकता दिवस आदि जयंती या दिवस मनाया जाता है तथा देश और दुनिया के इतिहास में 31अक्टूबर कई कारणों से महत्वपूर्ण है, जिनमें भारत में ही नही बल्कि देश और दुनिया के इतिहास में 31 अक्टूबर का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है तथा 31 अक्टूबर को हर वर्षो में नई व रोचक घट्नाय सामने आती रहती है जो इस प्रकार से व् क्रम से जाने |देश और दुनिया के इतिहास में 31 अक्टूबर कई कारणों से महत्वपूर्ण है, जिनमें से ये सभी प्रमुख हैं 1875 भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभ पटेल का जन्म हुआ 1914 ब्रिटेन तथा फ्रांस ने तुर्की के खिलाफ युद्ध की घोषणा की 1984 भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी 1996 रासायनिक अस्त्र प्रतिबंध संधि को लागू करने के लिए आवश्यक 65 देशों की मंजूरी मिली 2003 मलेशियाई प्रधानमंत्री महाथिर मुहम्मद के 22 साल लंबे शासन का अंत हुआ 2005 भारत की प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम का निधन हो गया. तथा इसमे महत्वपूर्ण प्रियदर्शिनी इन्दिरा गाँधी पुण्यतिथि दिवस के महत्वपूर्ण रूप में मनाए जाता व इसकी रानीतिक शासनकाल को बी महत्वपूर्ण माना जाता है

राजनेता, भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जीवन परिचय

प्रारंभिक जीवन  –
नाम इंद्ररा गांधी
पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी’
जन्म 19 नवम्बर 1917
जन्म स्थान उतर प्रदेस इलाहाबाद
विवाह 16 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद,
मृत्यु 31 अक्टूबर, 1984, नई दिल्ली
पिता का नाम जवाहरलाल नेहरु
माता का नाम कमला नेहरू
दादा का नाम मोतीलाल नेहरु

इंद्ररा गांधी का जन्म एक प्रसिध्द नेहरु परिवार में हुआ था जवाहरलाल और मोतीलाल दोनों सफल वकील थे और दोनों ने ही स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उनका परिवार आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से बहुत संपन्न था। माता-पिता का आकर्षक व्यक्तित्व इंदिरा को विरासत के रूप में मिला था। इंदिरा गांधी को बचपन में एक स्थिर पारिवारिक जीवन नहीं मिल पाया था क्योंकि पिता हमेशा स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त रहे और जब वह 18 वर्ष की थीं तब उनकी मां कमला नेहरू भी तपेदिक के से चल बसीं। पिताजी की राजनैतिक व्यस्तता और मां के ख़राब स्वास्थ्य के कारण इंदिरा को जन्म के कुछ वर्षों बाद भी शिक्षा का अनुकूल माहौल नहीं उपलब्ध हो पाया था। राजनैतिक कार्यकर्ताओं के रात-दिन आने-जाने के कारण घर का वातावरण भी पढ़ाई के अनुकूल नहीं था इसलिए पंडित नेहरु ने उनकी शिक्षा के लिए घर पर ही शिक्षकों का प्रबंध कर दिया था। अंग्रेज़ी विषय के अतिरिक्त किसी अन्य विषय में इंदिरा कोई विशेष दक्षता नहीं प्राप्त कर सकीं। इसके बाद उनको गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित ‘शांति निकेतन’ के ‘विश्व-भारती’ में पढ़ने के लिए भेजा गया। तत्पश्चात इंदिरा ने लन्दन के बैडमिंटन स्कूल और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया पर वह पढ़ाई में कोई विशेष दक्षता नहीं दिखा पायीं और औसत दर्जे की छात्रा ही रहीं।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में भागीदारी  –

इंदिरा ने बचपन से ही अपने घर पर राजनैतिक माहौल देखा था। उनके पिता और दादा भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। इस माहौल का प्रभाव इंदिरा पर भी पड़ा। उन्होंने युवा लड़के-लड़कियों के मदद से एक वानर सेना बनाई, जो विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस के साथ-साथ संवेदनशील प्रकाशनों तथा प्रतिबंधित सामग्रीओं का परिसंचरण भी करती थी। लन्दन में अपनी पढाई के दौरान भी वो ‘इंडियन लीग’ की सदस्य बनीं। इंदिरा ऑक्सफोर्ड से सन 1941 में भारत वापस लौट आयीं। आने के बाद वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल हो गयीं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें सितम्बर 1942 में गिरफ्तार कर लिया गया जिसके बाद सरकार ने उन्हें मई 1943 में रिहा किया। विभाजन के बाद फैले दंगों और अराजकता के दौरान इंदिरा गाँधी ने शरणार्थी शिविरों को संगठित करने तथा पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के देखभाल करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

राजनैतिक जीवन –

अंतरिम सरकार के गठन के साथ जवाहरलाल नेहरू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिए थे। इसके बाद नेहरू की राजनैतिक सक्रियता और अधिक बढ़ गई। त्रिमूर्ति भवन स्थित नेहरूजी के निवास पर सभी आगंतुकों के स्वागत का इंतज़ाम इंदिरा द्वारा ही किया जाता था। इसके साथ-साथ, उम्रदराज़़ हो रहे पिता की आवश्यकताओं को देखने की जिम्मेदारी भी इंदिरा पर ही पड़ गयी। वह पंडित नेहरु की विश्वस्त, सचिव और नर्स बनीं।इंदिरा को परिवार के माहौल में राजनीतिक विचारधारा विरासत में प्राप्त हुई थी और पिता की मदद करते-करते उन्हें राजनीति की भी अच्छी समझ हो गयी थी। कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी में इन्हें सन 1955 में ही शामिल कर लिया गया था। पंडित नेहरू इनके साथ राजनैतिक परामर्श करते थे और उन पर अमल भी करते थे।मात्र 42 वर्ष की उम्र में सन 1959 में वह कांग्रेस की अध्यक्ष भी बन गईं। नेहरू के इस फैसले पर कई लोगों ने उनपर पार्टी में परिवारवाद फैलाने का आरोप भी लगाया पर पंडित नेहरु की शक्शियत इतनी बड़ी थी की इन बातों को ज्यादा तूल नहीं मिला। सन 1964 में नेहरू के निधन के बाद इंदिरा चुनाव जीतकर शाष्त्री सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री बन गईं। अपने इस नए दायित्व का निर्वाहन इंदिरा ने कुशलता के साथ किया और सूचना और प्रसारण मंत्री के तौर पर आकाशवाणी के कार्यक्रमों को मनोरंजक बनाया तथा उसमें गुणात्मक वृद्धि भी की। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान आकाशवाणी ने राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करने में अतुलनीय योगदान दिया। इंदिरा गाँधी ने युद्ध के दौरान सीमाओं पर जाकर जवानों का मनोबल ऊंचा किया और अपने नेतृत्व के गुण को दर्शाया

प्रधानमंत्री पद पर   –

इंदिरा गाँधी 4 बार भारत की प्रधानमंत्री रहीं – लगातार तीन बार (1966-1977) और फिर चौथी बार (1980-84)।
सन 1966 में भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की अकस्मात् मृत्यु के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी भारत की प्रधानमंत्री चुनी गयीं।1967 के चुनाव में वह बहुत ही कम बहुमत से जीत पायीं और प्रधानमंत्री बनीं। सन 1971 में एक बार फिर भारी बहुमत से वे प्रधामंत्री बनी और 1977 तक रहीं। 1980 में एक बार फिर प्रधानमंत्री बनीं और 1984 तक प्रधानमंत्री के पद पर रहीं। लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने इंदिरा का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सुझाया पर वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं का नाम प्रस्तावित कर दिया। कांग्रेस संसदीय पार्टी द्वारा मतदान के माध्यम से इस गतिरोध को सुलझाया गया और इंदिरा गाँधी भारी मतों से विजयी हुई। 24 जनवरी, 1966 को इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री पद का शपथ ग्रहण किया। सन 1967 के चुनाव में कांग्रेस को बहुत नुक्सान हुआ पर पार्टी सरकार बनाने में सफल रही। उधर मोरारजी देसाई के नेतृत्व में एक खेमा इंदिरा गाँधी का निरंतर विरोध करता रहा जिसके परिणाम स्वरुप सन 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया। और जुलाई 1969 में इंदिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

सन 1971 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गाँधी के कारिय  –
पार्टी और देश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इंदिरा गाँधी ने लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी जिससे विपक्ष भौचक्का रह गया। इंदिरा गाँधी ने ‘ग़रीबी हटाओं’ नारे के साथ चुनाव में उतरीं और धीरे-धीरे उनके पक्ष में चुनावी माहौल बनने लगा और कांग्रेस को बहुतमत प्राप्त हो गया। कुल 518 में से 352 सीटें कांग्रेस को मिलीं।चुनाव के नतीजों ने ये साफ़ कर दिया था की जनता ने ‘ग्रैंड अलायंस’ कांग्रेस ओ, जनसंघ एवं स्वतंत्र पार्टी का गठबंधन को नकार दिया था। अब केंद्र में इंदिरा गाँधी की स्थिति बेहद मज़बूत हो गई थी और वह स्वतंत्र फैसले करने के लिए आज़ाद थीं।

पाकिस्तान के साथ युद्ध –

सन 1971 में बांग्लादेश के मुद्दे पर भारत-पाकिस्तान में युद्ध छिड़ा और पहले के तरह एक बार फिर से पाकिस्तान को मुह की खानी पड़ी। 13 दिसंबर को भारत की सेनाओं ने ढाका को सभी दिशाओं से घेर लिया। 16 दिसंबर को जनरल नियाजी ने 93 हज़ार पाक सैनिकों के साथ हथियार डाल दिए। युद्ध में हार के बाद ज़ुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति बने और उन्होंने भारत के समक्ष शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा जिसे इंदिरा गाँधी ने स्वीकार कर लिया और फिर दोनों देशों के बीच शिमला समझौता हुआ। इंदिरा गाँधी अमेरिकी खेमे में नहीं शामिल हुईं और सोवियत संघ से मित्रता और आपसी सहयोग बढ़ाया , जिसके परिणामस्वरूप 1971 के युद्ध में भारत की जीत में राजनैतिक और सैन्य समर्थन का पर्याप्त योगदान रहा।
पाकिस्तान से युद्ध के बाद की स्थिति – पाकिस्तान युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी ने अपना ध्यान देश के विकास की ओर लगा दिया। संसद में उन्हें पूर्ण बहुमत प्राप्त था जिससे निर्णय लेने में स्वतंत्रता थी। उन्होंने सन 1972 में बीमा और कोयला उद्योग का राष्ट्रियकरण कर दिया। उनके इन दोनों फैसलों को अपार जनसमर्थन प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त उन्होंने भूमि सुधार, समाज कल्याण और अर्थ जगत में भी कई सुधार लागू किये।

इंदिरा गाँधी की सता में आपातकाल (1975 – 1977)

सन 1971 के चुनाव में इंदिरा गाँधी को भारी सफलता मिली थी और उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में विकास के नए कार्यक्रम भी लागू करने की कोशिश की थी पर देश के अन्दर समस्याएं बढती जा रही थीं। महँगाई के कारण लोग परेशान थे। युद्ध के आर्थिक बोझ के कारण भी आर्थिक समस्यांए बढ़ गयी थीं। इसी बीच सूखा और अकाल ने स्थिति और बिगाड़ दी। उधर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोलियम बढती कीमतों से भारत में महँगाई बढ़ रही थी और देश का विदेशी मुद्रा भंडार पेट्रोलियम आयात करने के कारण तेजी से घटता जा रहा था। कुल मिलकर आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था जिसमें उद्योग धंधे भी चौपट हो रहे थे। बेरोज़गारी भी काफ़ी बढ़ चुकी थी और सरकारी कर्मचारी महँगाई से त्रस्त होने के कारण वेतन-वृद्धि की माँग कर रहे थे। इन सब समस्याओं के बीच सरकार पर भ्रस्टाचार के आरोप भी लगने लगे।सरकार इन सब परेशानियों से जूझ ही रही थी की इसी बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के चुनाव से सम्बंधित एक मुक़दमे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया। इंदिरा ने इस फैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की और न्यायालय ने 14 जुलाई का दिन तय किया पर विपक्ष को 14 जुलाई तक का भी इंतज़ार गवारा नहीं था। जय प्रकाश नारायण और समर्थित विपक्ष ने आंदोलन को उग्र रूप दे दिया। इन परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए 26 जून, 1975 को प्रातः देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई और जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य हजारों छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया।
इंदिरा ने जनवरी, 1977 में लोकसभा चुनाव कराए जाने की घोषणा की और इसके साथ ही राजनैतिक क़ैदियों की रिहाई हो गई। मीडिया की स्वतंत्रता फिर से बहाल हो गई और राजनीतिक सभाओं और चुनाव प्रचार की आज़ादी दे दी गई।

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